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NOTTO: हाल ही में नेशनल ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (NOTTO) ने एक नया निर्देश जारी किया है, जिसमें महिला रोगियों और मृतक दाताओं की महिला परिजनों को अंग आवंटन में प्राथमिकता देने की घोषणा की गई है।
o यह कदम अंग प्रतिरोपण में लैंगिक असमानता को दूर करने और देशभर में अधिक दान को प्रोत्साहित करने हेतु 10-बिंदुीय सलाह का हिस्सा है।
o 56,509 जीवित अंग दानों में से, 36,038 महिलाओं द्वारा किए गए, लेकिन केवल 17,041 अंग महिलाओं को मिले, जबकि 39,447 अंग पुरुषों को मिले।
o यह भारत में “अंग प्रत्यारोपण विरोधाभास” को दर्शाता है: महिलाएं सबसे अधिक दान करती हैं, लेकिन उन्हें सबसे कम प्राप्त होता है।
o भारत में अंग दान मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 के तहत होता है, जिसे 2011 में संशोधित कर मानव ऊतकों को शामिल किया गया था। यह अधिनियम अंगों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाता है और इसका उल्लंघन करने पर सख्त कानूनी और आर्थिक दंड है।
o वैश्विक स्तर पर, हर वर्ष 1,30,000 से अधिक ठोस अंग प्रत्यारोपण किए जाते हैं, जो वैश्विक मांग का केवल 10% ही पूरा करते हैं।
o भारत में हर साल 1.8 लाख लोग अंतिम चरण की किडनी बीमारी से ग्रसित होते हैं, लेकिन केवल लगभग 12,000 किडनी प्रत्यारोपण ही किए जाते हैं।
INS अरिदमन (INS Aridhaman): हाल ही में, भारत ने INS अरिदमन को शामिल करके अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता कोसुदृढ़ करने की दिशा में एक कदम उठाया है। यह भारत की तीसरी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी है।
o यह भारत की दूसरी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी का प्रतिनिधित्व करती है जो निर्माणाधीन है।
o इस पनडुब्बी का निर्माण विशाखापत्तनम स्थित शिप बिल्डिंग सेंटर में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी व्हेसल (ATV) परियोजना के अंतर्गत किया जा रहा है।
o आकार: लंबाई 112 मीटर (367 फीट), चौड़ाई 15 मीटर (49 फीट), और ड्राफ्ट 10 मीटर (33 फीट) ।
o विस्थापन और क्षमता: इसका भार 7,000 टन है और लंबाई 125 मीटर तक फैली है, जिससे यह अधिक संख्या में K-4 मिसाइलों को ले जाने में सक्षम होती है।
o सोनार प्रणाली: इसमें USHUS (Kilo-श्रेणी की पनडुब्बियों के लिए उन्नत सोनार) और पंचेंद्रिय (एकीकृत पनडुब्बी सोनार एवं सामरिक नियंत्रण प्रणाली, जिसमें निष्क्रिय, सक्रिय, निगरानी, दूरी मापन एवं इंटरसेप्ट सोनार शामिल हैं) से सुसज्जित है।
o अतिरिक्त विशेषताएं: इसमें एक जल के भीतर संचार प्रणाली, ट्विन फ्लैंक-ऐरे सोनार, और राफेल का ब्रॉडबैंड एक्सपेंडेबल एंटी-टॉरपीडो काउंटरमेजर्स शामिल हैं।
एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम: हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सभी योजनाओं के अंतर्गत सार्वभौमिक फोर्टिफाइड चावल आपूर्ति को 2028 तक जारी रखने की स्वीकृति दी है, जिसके लिए ₹17,000 करोड़ की पूरी धनराशि स्वीकृत की गई है।
o यह पहल 2018 के एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम पर आधारित है, जिसका उद्देश्य कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से मुकाबला करना है।
o बच्चों पर प्रभाव: ययह बौद्धिक एवं शारीरिक विकास को प्रभावित करता है, विशेष रूप से शैशवावस्था और प्रारंभिक बाल्यावस्था में गंभीर होता है।
o वयस्कों पर प्रभाव: यह कार्यक्षमता और उत्पादकता को कम करता है।
o गर्भावस्था पर प्रभाव: यह प्रसवपूर्व मृत्यु, असमय जन्म और कम वजन वाले शिशुओं (LBW) के जन्म का कारण बन सकता है।
o लक्ष्य लाभार्थी: यह छह प्रमुख समूहों पर केंद्रित है: बच्चे (6–59 माह), बच्चे (5–9 वर्ष), किशोर (10–19 वर्ष), गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली महिलाएं, और प्रजनन आयु की महिलाएं (15–49 वर्ष)
पहला पूर्ण रूप से डिजिटल साक्षर राज्य: हाल ही में, केरल के मुख्यमंत्री ने केरल को भारत का पहला पूर्ण रूप से डिजिटल साक्षर राज्य घोषित किया, जिससे डिजी केरल परियोजना के प्रथम चरण की सफल पूर्णता को चिह्नित किया गया। यह पहल, जिसे सभी स्थानीय निकायों में लागू किया गया है, का उद्देश्य जमीनी स्तर पर डिजिटल खाई को पाटना है।
o सर्वेक्षणों में 83.46 लाख परिवारों से 1.5 करोड़ लोगों को शामिल किया गया, जिसमें 21.88 लाख डिजिटल रूप से निरक्षर व्यक्तियों की पहचान की गई।
o 21.87 लाख प्रतिभागियों (99.98%) ने सफलतापूर्वक प्रशिक्षण और मूल्यांकन पूरा किया।
o वरिष्ठ नागरिकों और गृहिणियों ने अब ई-सेवाओं का उपयोग करना शुरू कर दिया है, जैसे कि ऑनलाइन बिल भुगतान और सोशल मीडिया पर सहभागिता।
o स्वयंसेवी प्रशिक्षकों, विशेष रूप से युवाओं ने इस परियोजना की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
o प्रशिक्षण ने दूरस्थ गांवों जैसे कि एडमलाकुडी और अट्टापडी तक पहुँच बनाई, जिससे सभी को समान अवसर मिला।
o यह परियोजना K-SMART प्लेटफ़ॉर्म को पूरक करती है, जो सरकारी सेवाओं जैसे भवन निर्माण अनुमति और जन्म प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन पहुंच प्रदान करती है।
डल झील: हाल ही में, श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील ने भारत का पहला खेलो इंडिया वाटर स्पोर्ट्स महोत्सव आयोजित किया, जिसमें नौकायन, कयाकिंग और कैनोइंग प्रतियोगिताएं शामिल थीं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य राष्ट्रीय प्रतिभा की पहचान करना और जलक्रीड़ा में भारत के भविष्य के ओलंपिक प्रदर्शन को बढ़ावा देना है।
o महत्त्व: इसे “कश्मीर का ताज” या “फूलों की झील” कहा जाता है, और यह पर्यटन व मनोरंजन का केंद्र है।
o आकार और गहराई: यह 18 वर्ग किमी (21.1 वर्ग किमी आर्द्रभूमि का हिस्सा) क्षेत्र में फैली है, जिसकी औसत गहराई 5 फीट और अधिकतम गहराई 20 फीट है।
o तटरेखा: इसकी लंबाई 15.5 किमी है, जिसमें मुगल बागान, पार्क, हाउसबोट और होटल शामिल हैं।
o तैरते बगीचे: “राड”, जहां जुलाई–अगस्त में खिले हुए कमल दिखाई देते हैं।
o बेसिन और द्वीप: इसमें चार बेसिन हैं – गगरिबल, लोकुट डल, बोड डल, नागिन; द्वीपों में रूप लंक (लोकुट डल) और सोना लंक (बोड डल) शामिल हैं।
o तैरता बाजार: यहाँ विक्रेता शिकारा से सीधे पर्यटकों को सामान बेचते हैं।
वैश्विक महत्त्वपूर्ण कृषि धरोहर प्रणालियाँ (GIAHS): हाल ही में, कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री ने लोकसभा को सूचित किया कि भारत में तीन वैश्विक महत्त्वपूर्ण कृषि धरोहर प्रणाली (GIAHS) हैं।
o उद्देश्य: संरक्षण, सतत अनुकूलन और सामाजिक-आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करना, ताकि किसानों के सामने आने वाले खतरों को कम किया जा सके।
o दृष्टिकोण: बहु-हितधारक ढाँचे के माध्यम से तकनीकी सहायता प्रदान करता है, पारंपरिक कृषि ज्ञान को बढ़ावा देता है और कृषि उत्पादों एवं कृषि-पर्यटन के लिए बाज़ारों को प्रोत्साहित करता है।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वृक्षारोपण: हाल ही में, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, रिवरसाइड द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पेड़ लगाने से उच्च अक्षांशों की तुलना में सबसे अधिक शीतलन प्रभाव और अग्नि शमन लाभ मिलता है।
o उच्च अक्षांशों पर, वृक्षारोपण का हल्का उष्मा प्रभाव हो सकता है, जबकि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में शीतलन प्रभाव अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।
o वाष्पोत्सर्जन (“वृक्षों का पसीना”): मिट्टी से पानी वृक्षों में प्रवेश करता है और पत्तियों से वाष्पित हो जाता है, जिससे वायु और पेड़ दोनों ठंडे होते हैं।
o छाया और आर्द्रता के प्रभाव: वृक्ष सूर्य के प्रकाश को ज़मीन तक पहुँचने से कम करते हैं,
o उष्णकटिबंधीय सवाना और अन्य क्षेत्रों में वृक्ष घासों की तुलना में अधिक अग्निरोधक होते हैं, जिससे आग पर नियंत्रण में मदद मिलती है।
मेड इन इंडिया लेबल योजना: हाल ही में, सरकार ने मेड इन इंडिया लेबल योजना को अद्यतन किया है ताकि घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित किया जा सके और उपभोक्ताओं को उत्पाद की उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी जा सके। अगले तीन वर्षों के लिए ₹995 करोड़ का वित्त पोषण प्रस्तावित किया गया है।
o उद्देश्य: उत्पाद की प्रतिष्ठा को मजबूत करना, प्रामाणिकता की गारंटी देना और ऐसे उत्पादों का प्रमाणन करना जो भारत से उत्पन्न हुए हों या स्थानीय रूप से प्राप्त सामग्री का उपयोग करते हों।
o स्वरूप: यह एक स्वैच्छिक प्रमाणन है, जिसमें एक लोगो और QR कोड प्रदर्शित किया जाएगा जिसमें निर्माण स्थान, लेबल की वैधता और उत्पाद विवरण की जानकारी होगी।
o क्रियान्वयन: इसका नेतृत्व DPIIT द्वारा किया जा रहा है, जिसमें भारतीय गुणवत्ता परिषद (QCI) और इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन परामर्श समर्थन प्रदान कर रहे हैं।
o उद्देश्य: उत्पादों को उनकी उत्पत्ति के आधार पर पहचान प्रदान करना।
- भारतीय उत्पादों को प्रमाणित एवं ब्रांड करने के लिए तंत्र का विकास करना।
- उत्पादों को घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मान्यता दिलाना।
- प्रामाणिकता, गुणवत्ता और भिन्नता को उजागर कर बाजार में उनकी स्थिति को सुदृढ़ करना।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA): हाल ही में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने स्पष्ट किया कि बाघ गलियारे अब केवल 32 “सबसे कम लागत वाले मार्ग” तक सीमित हैं, जिनकी पहचान 2014 में की गई थी और जो व्यक्तिगत बाघ संरक्षण योजनाओं (TCPs) में दर्ज हैं।
o स्थापना: वर्ष 2006, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत।
o उद्देश्य: राज्यों के साथ MoUs के माध्यम से बाघ अभयारण्यों के प्रबंधन में केंद्र-राज्य जवाबदेही सुनिश्चित करना।
- बाघ संरक्षण पहलों पर संसदीय पर्यवेक्षण को बढ़ावा देना।
- बाघ अभयारण्यों के आसपास रहने वाले स्थानीय समुदायों की आजीविका संबंधी चिंताओं का समाधान करना।
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