मंगल की धूल (Martian Dust)

मंगल की धूल (Martian Dust): एक नई अध्ययन रिपोर्ट मंगल ग्रह पर भविष्य के अभियानों के लिए अंतरिक्ष यात्रियों पर पड़ने वाले स्वास्थ्य जोखिमों को उजागर करती है।

  • इसके बारे में: मार्स की धूल के कण अत्यंत सूक्ष्म होते हैं (लगभग मानव के बाल की चौड़ाई के 4% के बराबर), जिससे वे फेफड़ों की गहराई तक प्रवेश कर रक्त प्रवाह में समा सकते हैं और खतरनाक बन जाते हैं।
  • विषैले घटक: इसमें सिलिका धूल (जो सिलिकोसिस का कारण बनती है), लौह धूल, पर्क्लोरेट्स, जिप्सम, और क्रोमियम व आर्सेनिक जैसे हानिकारक धातुएं पाई जाती हैं।
  • स्वास्थ्य जोखिम: सिलिका धूल फेफड़ों की बीमारियों (जैसे सिलिकोसिस) का कारण बन सकती है।
  • मंगल पर विकिरण का संपर्क फेफड़ों की बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकता है।
  • पर्क्लोरेट्स थायरॉयड के कार्य पर प्रभाव डाल सकते हैं।
  • मंगल की धूल भरी आंधियाँ: हर मंगल वर्ष (पृथ्वी के 687 दिन) में होने वाली ये घटनाएँ दक्षिणी गोलार्ध की गर्मियों में अपने चरम पर होती हैं। हर तीसरे मंगल वर्ष, ये ग्रहव्यापी धूल आंधियों में बदल जाती हैं।
  • मंगल की धूल से निपटने के उपाय:
  • पोषण संबंधी प्रतिरोधक उपाय: क्रोमियम के प्रभाव को कम करने के लिए विटामिन C का उपयोग और पर्क्लोरेट्स से होने वाले थायरॉयड जोखिम को कम करने के लिए आयोडीन का सेवन किया जा सकता है।
  • सुरक्षा उपाय: धूल को हटाने के लिए एयर फिल्टर और स्वयं-साफ होने वाले अंतरिक्ष सूट और इलेक्ट्रोस्टैटिक रिपल्शन डिवाइसेज़ का उपयोग धूल कणों को हटाने के लिए किया जा सकता है।
  • महत्व: यह आवश्यक है क्योंकि मंगल अभियानों में पृथ्वी पर शीघ्र वापसी और चिकित्सकीय उपचार की सुविधा उपलब्ध नहीं होती।